उठी मन मैं एक लहर प्यार की
सोचा उसे कीनारा लगने दूँ
कभी सोचा मुट्ठी मैं कर लूँ बंद लहरों को
कैद कर लूँ आपने ज़ज्बातों को
मगर वो तो लहर है
फीसल जायेगी मुट्ठी से
हाथों मैं छोड़ देगी बस रेत
सोचा उस रेत को ही
क्यों न समेट लूँ
वो तो हमारे हाथों मैं रहेगी
उसी रेत से बनाऊँगी एक मंज़र
एक मंज़र हमारे प्यार का
एक मंजील हमारी जीत का
एक मंजील sirf रेत का
एक मंजील sirf और sirf
हमारी यादों का .............................

No comments:

Post a Comment

वास्ता

जब कोई वास्ता नही तेरा मुझसे , तो फिर आईने को छु कर गुजरता है, हर घड़ी हर लम्हा क्यों अक्स तेरा आब भी मेरा पीछा किया करता है ? क्यों द...