वास्ता

जब कोई वास्ता नही तेरा मुझसे ,
तो फिर आईने को छु कर गुजरता है,
हर घड़ी हर लम्हा क्यों अक्स तेरा
आब भी मेरा पीछा किया करता है ?
क्यों दूर मुझसे जा कर आवाज़
मुझी को दिया करते हो
क्यों यादों की डोरी से
बंधे मुझे चुपके चुपके चोरी से
मेरे सपनों की नगरी मैं
दाखिल तुम हर रोज़ शोर मचाया करते हो ?.......................

सवाल

जब तुम्हारी याद तड़प बन गए
हमने उसे एक नाम दे दिया
ऐसे ही तमाम पलों की यादें
समेटी तो ख्याल
लफ्जों मैं उतर आए
ये खामोश इबादत है..................
चुप चुप से पलों मैं
सांसों में
समेट लेना ,
हम जी जायेंगे
बरसों की दूरी
और नदी की रेत पर
तुम्हारा नाम लिख कर
पूछेंगे ख़ुद से
"तुम इतने अच्छे क्यों हो ?".............

आस

झलक भर क्या देखा उनको
अल्फाज़ ख़ुद-ब-ख़ुद
ग़ज़ल बन गए
इस कदर बहते चले गए हम उनकी रौ मैं
न ख़ुद की ख़बर रही
न फ़िक्र ज़माने की
आब तो आलम ये है की
एक झलक उनकी
देख लेने की आस बाकि है
वो आए न आए -
उनके आने की आस बाकि है...........

'

खफा

रूह मुझसे खफा है
ज़िन्दगी है नाराज़
चाहती हूँ देना
किसी को अपनी आवाज़
आरजू है की सुने मुझे भी कोई
चाहत है देखे मुझे भी कोई
झरोखे से देखती हूँ छुप कर
बदल की ओ़ट से निकल कर चाहती हूँ मिलना
मगर क्या करून रूह मुझसे खफा है
ज़िन्दगी है नाराज़ ........

कुछ भी नही

कुछ भी नही है देने को हमारे पास
न एक शब्द अपनी कविता की
न एक आस हमारी खुशी की
न एक वक्त बाटने को
न एक अध्याय हमारे पहचान की
न एक साँस हमारे प्यार की
न एक ज़ुबानी हमारे लफजों की
न एक खुशी वो भी बनावट की
न एक हसी हमारे खुशी की
न एक आह हमारे दर्द की
क्या है देने को हमारे पास
शायद कुछ भी नही
बस एक नज़र काफी है एक एहसास दिलाने को ............................

पैमाना

आंखों मैं तेरी यादें बसती है
सांसों मैं तेरी खुशबू रहती है
तनहा अकेली है ये राहें
इन राहोँ मैं कहीं तेरी आहट रहती है
सजी है तस्वीर दिल की इन दीवारों पे
इन तस्वीर मैं दिल की धड़कन रहती है
किताबों के अक्षर मैं
तेरे गीतों के साज़ रहते हैं
प्याला था तेरी हाथों मन पैमाने का
इन पैमानों मैं हम रोज़ जलते हैं .................

मन्दिर

सजाना चाहती हूँ मूरत तेरी
इस दिल के मन्दिर में
चढाना कहती हूँ फूल प्यार के
तेरी इन कदमों में
चाहती हूँ किन्कार्ताव्यविमोढ हो
तुझे पाना
चाहती हूँ गवाना प्यार तुझ पर
कगार पे खड़े हैं हम
दिल प्यार के लिए
चाहती हूँ जल जाना
दिए में बस प्यार तेरा लिए ...............

नसीब

चाँद से मिल रहे थे सितारे
नाव को मिल रहे थे किनारे
साहिलों के रेत से जब पुछा मैंने
क्या कोई है मेरा अपना ?
रेत ने हवा के सहारे से किया मुझे इशारा
दूर नही है मंजिल तुम्हारा
खुसी मैं झूमते लौटी मैं घर को
और झूमते हुए कहा अपने मन को
जज्बात को मैं यूँ न छलकने दूँ
मुट्ठी मैं हर किसी के नसीब नही होता
जिसे चाहो वो कभी करीब नही होता है

अधूरी कवीता

शमां को पीघलते देर नही लगती
आरमां को बीखरते देर नही लगती
अंजाने मैं दूंदते रहे अपने प्यार की लौ को
उस लौ को दील जलाते देर नही लगती
ऐ जख्में-ऐ -दील बाद मुद्दत के
प्यार का चला था सीलसीला
इस सिलसिले को सहर बनते देर नही लगती
अश्कों के समंदर मैं ख्वाबों को डूबते देर नही लगती ...................................

फल्सफां

बाद मुद्दत के पता चल फल्सफां उन्हें
अफसाना बयां कर रहे थे
बात तो हो रही थी मगर लफ्ज नही थे
चाँद बातों मैं ही हम खो गए सपने मैं
सपने तो थे मगर आंखों मैं नींद नही थी
ऐ मेरे दील प्यार तो हुआ है तुझे भी
वरना दरख्तों से मेरा हाल न पुछा करते
यूँ ही न कहा करते दर्द भरा दील तो मेरा भी है
और अफसाना बयां करने को हमसे न पुछा करते
आहीस्ता आहीसता जले तो हो तुम भी
रातों मैं आँख खुली कर सोये तो हो तुम भी
वरना रातों मैं हिचकियाँ हमें आया न करते ...........................

वास्ता

जब कोई वास्ता नही तेरा मुझसे , तो फिर आईने को छु कर गुजरता है, हर घड़ी हर लम्हा क्यों अक्स तेरा आब भी मेरा पीछा किया करता है ? क्यों द...